शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

अक्षर-प्रेम

तुम इश्क़ की गहराईयों का माप क्यों पूछते हो मुझसे 
मुझे खबर नहीं अब धरातल की स्थिति क्या है । 
मैं डूब गया हूँ और ऐसे कुछ ठहर गया हूँ वक़्त में 
सपनों और हक़ीक़त में रहा अब फर्क कहाँ  है। 

खुदा से मांगूं अब क्या, जो तेरा साथ लिखा लकीरों में,
मुझको नहीं फ़िकर , क्या आएगा हमारी तकदीरों में । 
मोहब्बत  में नशा भी खूब है, और है खूब  साथ होश का भी 
तू है साहिल मेरा, मेरी कश्ती भी, किनारा भी। 

साँसों का संगीत मुझको अब समझ आता है थोड़ा थोड़ा,
धड़कनों की साज तुम, साकी तुम ही मेरी, तुम ही हो हाला!
मैं तुम में ढलना  चाहूँ जैसे सूर्य उतरे क्षितिज में  सायं -वेला  
बस जाओ तुम मुझमें ऐसे, रोशन  होती शब जैसे पहन प्रकाश का चोला ।  

आलोकित  हो तुझसे मैं जीवन के नए आयाम तरूँगा 
मेरे ठहराव में मैं, प्रेम लहरों का सृजन करूँगा । 
तेरा हूँ, तेरा हूँ और तेरा ही हूँ मैं अनंत की सीमाओं तक 
तुझमे रहूंगा, तेरा घर बनूंगा, मोहब्बत-इबादत दिन-रात करूंगा!

बुधवार, 11 सितंबर 2013

हे ईश्वर !

हे ईश्वर ,  विरोधाभासापूर्ण भी क्या तेरे मिजाज हैं,
जिनको तूने रचा है, वो ही तुझको गढ़ते जाते है !
प्रकृति के बनाये यूँ तो नियम तुमने कई ,
तुम्हारे-सृजित ये सीमा-रेखाओं के खुनी चित्र उकेरते जाते हैं । 

तभी मैं आवश्यक प्रश्न भी तुझसे करता हूँ,
मैं तुझसे सृजित या, दर्शन-चिंतन से सृजन तेरा मैं करता हूँ !
विशृंखलता से क्रम का अवरोहन जो तू करवाता है ,
अभिभूत मेरा मन, पहेलियों में बंटता चला जाता है । 

स्वरचित गुम्फित गुत्थियाँ गले मैं लगाता ,
जब भी तेरे अस्तित्व पर कोई प्रशनचिन्ह मैं लगाता  । 
स्वरूप अनंत है तुम्हारा,
पर सूक्ष्म में भी निहित मैं तुझे ही पाता !

महत्वकान्छओं के शहर में जब भी ,
सपनों के लहू से मन को नहाया पाता ,
तेरे ही शरण छिपा मैं खुद को, 
जीवन की हर धुप भुलाता । 


मेरी घड़ी की रुकी हुई सुई

बीते कल में मुड़कर देखना
यूँ तो  अच्छा नहीं लगता सोचने में, 
पर बेशर्म आदत का जोर ही कुछ ऐसा है ,
यादें घुमड़-घुमड़ जेहन में तूफ़ान खेलती हैं !

कसक सी है मन में, काश वक़्त की पूंछ पकड़ 
रोक ही लिया होता उस पल को,
बस एक चित्र बन कर रह जाता हमारा साथ,
परस्पर आगोशित रूहों का समाहार !

खैर, हर एक "काश" में एक अद्वितीय ब्रह्माण्ड ही छिपा होता है !
यूँ सामानांतर प्रायिकताओं का नाच-नाच मन में एकाकार हो जाना,
आभासित ही तो है वक्त के साथ साथ चलते जाना!
टंगे कपड़े की तरह फड़फड़ाना, और दौड़ना, दो पृथक वास्तविकताएं हैं । 

दिल की तस्वीर से तुम्हें निकाल फिर एक दिन
हम प्रकृति के नए नियम रचेंगे,
गतिज दुनिया के केंद्र में रुके हुए हम,
ऐसे ही तो हम नए-नए ब्रह्माण्ड रचेंगे !



रविवार, 1 जुलाई 2012

खुदा क्या तू जिन्दा है?

बंटी टुकड़ों में रूह है मेरी
क्या ये प्रायिकताओं  का खेल है!
शायद साथ नहीं हैं लकीरें हाथों की
बदलूं क्या, खंजर का मालिक भी कोई और है ।

अश्क भी रूठ गए हमसे तो क्या
तेरी वफ़ा के जमाने का अभी शोर है!
जाने कब छिन जाएगी मेरी दुनिया मुझसे
इस भंवर का दीखता न अब कोई छोर है ।

जल पाऊं भी तो कैसे हाला की बूंदों से
मोहब्बत में जलने का मजा भी तो कुछ और है!
जिंदगी की दहलीज से अब लौटते से ये कदम
सुना जन्नत में ख़ुदा की मय्यत का शोर है।

मिला पायेगा क्या तू हमको
तेरे जमाने पर चला तेरा भी क्या जोर है!
अंधियारों में ढूंढते रहेंगे शायद उसे
परछाईयों की वफ़ा के इम्तेहान का दौर है। 

शनिवार, 16 जून 2012

परिभाषा मेरे अस्तित्व की

                                 परिभाषा मेरे अस्तित्व की 
आ जाओ न यादों से निकल फिर , कि बीती  शब के धागे फिर महफ़िल बुनें ।
तुम्हारा ख्याल महज तरसते अरमानों की दास्ताँ नहीं , आँखों की निरपेक्ष हकीक़त चूमे ।
कि काल का दरिया अनवरत बहता तो है, पर आओ न अपनी यादों की तरह,
जिनमें डूब, मैं जी लेता एक ब्रह्माण्ड की उम्र, और वक़्त का सौदागर , ठगा सा,
मुंह  ले रह जाता है, क़ि नुक्सान हो गया उसे व्यापार में,
बिना कोई वक़्त खरीदे, मैं इतने ख्वाब जो जी आया इस जहान में।
चली आओ तुम इस बार इस गुलशन में , तुम्हें संग देख अपने ,
प्रायिकता की दुनियाओं को सारी समेट लूँ, और रच पाऊं
अपनी दुनिया तुम्हारे साथ और नितांत काल को विलीन हो जाऊं तुझमें ।।
द्रष्टा और स्रष्टा में  भला कोई भेद भी होता है?
 जब परिभाषित ही हूँ तुझसे तो , पृथक अस्तित्व ही नहीं वास्तव,छलावा है जेहन का;
भौतिकी के नियम नहीं बतलाते दो कृष्ण-छिद्र आपस में क्या खेल खेलते होंगें।।

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

बस यूँ ही बैठे-बैठे

 

मोहब्बत भी देखो कैसे-कैसे अल्फाज कहती है,

बेबाक अदाएं कुछ दिल के सारे हाल कहती हैं,

कितनी बार समझाया नादान यादों को, थोड़ा पर्दा करो , 

जिद्दी हर बार भीड़ में लबों पर आ शर्मसार करती हैं। 

रविवार, 4 सितंबर 2011

मेरी चाहत का आईना


मैं तेरी अकेली  रातोँ  का 
एक चाँद बन जाना चाहता हूँ ,
तेरे दिल में अपनी एक 
मैं तस्वीर सजाना चाहता हूँ,
हैं अरमान  तेरे  जिस  मोहब्बत  के  
 मैं तुझसे  वो  हरबार  जताना  चाहता  हूँ ,
मैं तुझको  अपनी  मोहब्बत  का 
हर  साज  सुनाना  चाहता  हूँ |
तेरी  आँखों  की  अनकही  को 
मै  आवाज  बनाना  चाहता  हूँ ,
तेरे  पलकोँ  से  मैं  अपनी 
जीवन  की  धुन  बजाना  चाहता  हूँ ,
रेगिस्तान  से  इस  मन  में  मेरे 
मैं  एक  फूल खिलाना  चाहता  हूँ ,
मैं  तेरे  जीवन  से  अब  हर  गम 
की  परछाई  मिटाना  चाहता  हूँ |

झुकती  तुम  किसी  खुदा  के  दर  पर 
तुझको  अपना  भगवान्  बनाना  चाहता  हूँ ,
तेरी  खातिर  इस  जमाने  से  मैं 
सजदे के  अंदाज  चुराना  चाहता  हूँ ,
तेरे  जीवन  के क्षितिज   पर  मैं  खुशियोँ
का  एक  चाँद  उगाना  चाहता  हूँ ,
मैं  तुझको  अब  ऐ  जीवन  मेरे 
काल  के  पार  ले जाना  चाहता हूँ |
बन्धनोँ से  रख  मुक्त  तुम्हें  मैं 
आजादी  की  नई  उड़ान  भरवाना  चाहता  हूँ ,
तेरे  हर  आगाज  से  मैं 
इच्छित  अंजाम  मिलाना  चाहता  हूँ ,
तुझको  मैं  खुशियोँ  की  एक 
आवाज  बनाना  चाहता  हूँ ,
तेरे  ख्वाबोँ  को  मै  हमारी  दुनिया  में 
हकीक़त  की  पोशाक  पहनाना   चाहता  हूँ |


है  उठती  पुकार  मेरे  भी  मन  में 
इस  हिज्र  का  मैं  सर्वस्व  मिटाना  चाहता  हूँ ,
जमाने  कुछ  दस्तूर  दिखाए  हमने 
मैं  दुनिया  को  नए  संस्कार  सिखाना  चाहता  हूँ ,
फरेबी  दुनिया  के  रस्मोँ  से  मैं 
एक  नया  कुरुक्षेत्र  लड़ जाना  चाहता हूँ ,
तुझको  अपनी  मधुशाला  का मैं  
हर जाम  पिलाना  चाहता  हूँ |
भव मौजोँ पर  बहती  जीवन  कश्ती  मेरी 
तुझको  साहिल  हर  बार  बनाना  चाहता  हूँ ,
एक  जन्म  हो  दो  जन्म  होँ, मैं  हमारे  "हम "  को 
जन्म सीमाओं  से  पार  ले  जाना चाहता  हूँ ,
मैं  अपनी  जीवन  पुस्तक  का  तुझसे 
हर  अध्याय लिखवाना  चाहता  हूँ ,
अधूरे  कुछ  अरमानोँ का  मैं  तुझको 
एक  विस्तार  बनाना  चाहता  हूँ |


तुझसे  किये  हर  वादे  को  निभाने  खातिर  
मैं  नया  भीष्म  बन  जाना  चाहता  हूँ ,
मैं  उछ्रिंक्ल अपनी  प्रीत  का 
तुझे  एक  अनुशासित मीत बनाना  चाहता  हूँ ,
है  चिंगारी ,तुझमें भी ,मुझमें भी 
मोहब्बत की  इनसे  मैं एक  लपट  जलाना  चाहता  हूँ ,
दिक्  और  काल  से  परे  होकर मैं प्रेम  के  
अक्षर  एहसास  जी  जाना  चाहता  हूँ |
तेरे  ख्वाबों  को  मैं  अपने  जीवन 
का  मुकाम  बनाना  चाहता  हूँ ,
अपने  आधे  तन  में  मैं तुझको 
रीतिपुर्व समाना चाहता  हूँ ,
संग  तेरे  मिल  मै  सृजन  की 
एक  धुन  बजाना  चाहता  हूँ ,
मेरे  हर  ख्वाब  एहसास  मेरी  सोच  मेरे  अस्तित्व  के  मालिक 
मैं  तेरी  छाँव  में  जीवन की  हर  धूप  भुलाना  चाहता  हूँ |