बुधवार, 11 सितंबर 2013

मेरी घड़ी की रुकी हुई सुई

बीते कल में मुड़कर देखना
यूँ तो  अच्छा नहीं लगता सोचने में, 
पर बेशर्म आदत का जोर ही कुछ ऐसा है ,
यादें घुमड़-घुमड़ जेहन में तूफ़ान खेलती हैं !

कसक सी है मन में, काश वक़्त की पूंछ पकड़ 
रोक ही लिया होता उस पल को,
बस एक चित्र बन कर रह जाता हमारा साथ,
परस्पर आगोशित रूहों का समाहार !

खैर, हर एक "काश" में एक अद्वितीय ब्रह्माण्ड ही छिपा होता है !
यूँ सामानांतर प्रायिकताओं का नाच-नाच मन में एकाकार हो जाना,
आभासित ही तो है वक्त के साथ साथ चलते जाना!
टंगे कपड़े की तरह फड़फड़ाना, और दौड़ना, दो पृथक वास्तविकताएं हैं । 

दिल की तस्वीर से तुम्हें निकाल फिर एक दिन
हम प्रकृति के नए नियम रचेंगे,
गतिज दुनिया के केंद्र में रुके हुए हम,
ऐसे ही तो हम नए-नए ब्रह्माण्ड रचेंगे !



1 टिप्पणी:

Unknown ने कहा…

अनुभव के कैनवास पर
स्मृतियों के रंग
कुछ इस तरह फैलते जाते हैं
कल्पना को पंख लग जाते हैं मानो...